मैं पहले बता दूँ — अनिता उनका असली नाम नहीं है। वे दिल्ली में रहती हैं, ग्रेटर कैलाश के पास, और उन्होंने कहानी हमें बताई इस शर्त पर कि नाम बदल दें। 58 साल की हैं। पति को कैंसर से चार साल पहले खो दिया। बत्तीस साल की शादी थी।
वे कहती हैं: "पति जाने के बाद मैंने तय किया था कि अब मैं अकेली बूढ़ी हो जाऊँगी। यह बुरा लक्ष्य नहीं था। बस असम्भव लक्ष्य था।"
पहले दो साल
पहले दो साल अनिता ने बस घर संभाला। बेटी ऑस्ट्रेलिया में थी, बेटा बैंगलोर में। अनिता दिल्ली में अकेली। उनका एक नियम था — "रोज़ सुबह छह बजे उठना है। चाय बनानी है। बाग़ में पौधे देखने हैं।" यह नियम उनका ज़िंदा रहने का तरीक़ा था।
उन्होंने किताबें पढ़ीं। बहुत सारी। हिंदी साहित्य, अंग्रेज़ी उपन्यास, कुछ ग़ज़लें। पति कभी ज़्यादा पढ़ने वाले नहीं थे। अब किताबें ही उनकी संगत थीं।
तीसरे साल की जनवरी
जनवरी 2023 में दिल्ली में एक साहित्य उत्सव हुआ। बेटी ने फ़ोन पर कहा: "माँ, अब बाहर निकलो। तुम्हें किताबें पसंद हैं, चलो वहाँ।"
अनिता ने सोचा — अकेले जाऊँगी, बोर होऊँगी, वापस आऊँगी। मगर गईं। तीन दिन का फ़ेस्टिवल था। वे पहले दो दिन पीछे बैठकर सुनती रहीं।
तीसरे दिन एक हिंदी कवि का सत्र था। कवि को अनिता पहले से पढ़ती थीं। सत्र के बाद क़िताब विमोचन था। अनिता पंक्ति में खड़ी हो गईं हस्ताक्षर के लिए।
पंक्ति में खड़ा वह आदमी
उनके आगे एक आदमी था। 62 के आस-पास। भूरा कुरता, सफ़ेद दाढ़ी। हाथ में वही किताब। वह आदमी पलटा और पूछा: "क्या आपने इनकी पिछली किताब पढ़ी है?"
अनिता ने कहा: "हाँ, 'सफ़र के बाद'।"
उसने मुस्कुराकर कहा: "वह मेरी बीवी की पसंदीदा थी।"
"थी?" अनिता ने पूछा।
"तीन साल पहले चली गईं।" उसने सरलता से कहा।
अनिता ने कहा: "मेरे पति भी चार साल पहले।"
दोनों एक पल चुप रहे। फिर पंक्ति आगे बढ़ी। वे दोनों हस्ताक्षर लेकर बाहर निकले, और कैफ़े में बैठ गए।
पहली बातचीत
अनिता आज मुझे बताती हैं: "उनका नाम विजय है। पहली बातचीत में हमने अपने जाने वाले जीवनसाथियों की बात की। यह अजीब लगेगा सुनने में, मगर यही सबसे स्वाभाविक था।"
विजय चेन्नई से थे, दिल्ली में कुछ काम से आए थे। रिटायर्ड डॉक्टर। बेटियाँ अमेरिका में। बीवी को दिल का दौरा पड़ा था अचानक।
दोनों ने फ़ोन नंबर बाँटे। अनिता सोच रही थीं — क्या यह सही है? क्या मैं पति को धोखा दे रही हूँ? मगर पति को जाए चार साल हो गए थे। और विजय ने चार साल के पहले दिन से एक शब्द भी "फ़्लर्ट" का इस्तेमाल नहीं किया था।
अगले छह महीने
विजय चेन्नई लौट गए। दोनों महीने में एक बार फ़ोन पर बात करने लगे। फिर सप्ताह में एक बार। फिर रोज़।
अनिता कहती हैं: "हम बूढ़े थे, जल्दी में नहीं थे। हम कविताएँ पढ़ते थे एक-दूसरे को। हम अपने पति-पत्नियों की बातें करते थे। वह मुझे अपनी मैरी की पसंद की रेसिपी बताते, मैं उन्हें पति के पसंदीदा गानों की।"
छह महीने बाद विजय दिल्ली आए। अनिता ने अपनी एक सहेली और बेटी को बताया। बेटी ने वीडियो कॉल पर विजय को देखा। उसने कहा: "माँ, मुझे अच्छे लगे। मगर धीरे।"
बच्चों की शंकाएँ
अनिता का बेटा मुश्किल था। "माँ, अभी नहीं। पापा की याद अभी ताज़ा है।" मगर पापा की याद अनिता के अंदर थी, बेटे के अंदर नहीं। अनिता ने बेटे को तीन महीने दिए। फिर एक बार दिल्ली आया तो विजय से मिलवाया। खाने पर।
तीन घंटे के खाने के बाद बेटा माँ के पास आया। बोला: "माँ, मुझे अब भी आदत नहीं है। मगर पापा की जगह कोई ले नहीं रहा। आप अपनी ज़िंदगी जीयो।"
अनिता को यह वाक्य अब भी याद है। हमें बताते हुए उनकी आँखें थोड़ी नम हो गईं।
आज की स्थिति
अनिता और विजय ने शादी नहीं की। वे अपने-अपने घरों में रहते हैं — अनिता दिल्ली, विजय चेन्नई। साल में छह बार मिलते हैं। बाक़ी दिन फ़ोन पर बात होती है।
अनिता कहती हैं: "हमारे पास एक-दूसरे की संपत्ति नहीं है। हमारे पास एक-दूसरे का समय है। यह बेहतर है।"
वे यह भी कहती हैं: "जब मैं 58 की थी और पति गए थे, तो लगता था कि ज़िंदगी रुक गई। अब 62 की हूँ, विजय के साथ हूँ, और लगता है कि ज़िंदगी का एक और अध्याय खुला है। सब नहीं, मगर एक नया अध्याय।"
उनकी बात जो इसे पढ़ रहे
मैंने अनिता से पूछा — पाठकों के लिए एक बात कहना चाहेंगी? उन्होंने कहा: "बाहर जाइए। साहित्य उत्सव, संगीत कार्यक्रम, कोई कक्षा। घर में बैठने से कोई नहीं मिलता। और जब मिले, तो अपने जाने वाले की बात मत छुपाइए। जो समझेगा वही सही व्यक्ति है।"