मुझे पिछले महीने एक पाठक का पत्र मिला। वे लखनऊ में रहती हैं, 57 साल की हैं, पति को गए दो साल और तीन महीने हो चुके हैं। उन्होंने लिखा: "दीदी, सब कहते हैं अब आगे बढ़ो। मेरी बेटी कहती है एक साल काफ़ी था। मेरी बहन कहती है तीन साल से पहले नहीं। मैं क्या करूँ?"
मेरा जवाब उन्हें भी वही था जो आपको है। कोई कैलेंडर नहीं है। विधुरता पर कोई सही तारीख़ नहीं छपी। जो लोग आपको नंबर बताते हैं — छह महीने, एक साल, दो साल — वे अपनी असहजता संभाल रहे हैं, आपका दुःख नहीं।
दुःख की रेखा सीधी नहीं होती
पहले साल में शायद आप समझें कि आप कभी तैयार नहीं होंगे। फिर अचानक किसी मंगलवार को, सब्ज़ी काटते हुए, आप पाएँ कि आज आपने उनका नाम लिए बिना चार घंटे बिताए। और फिर अगले दिन आप फिर रोएँ।
यह सामान्य है। दुःख लहरों में आता है, क़तार में नहीं। तैयार होने का मतलब यह नहीं कि लहरें रुक गईं। मतलब यह है कि आप तैरना सीख गए।
तैयार होने के असली संकेत
मैं आपको कुछ असल चिह्न बताती हूँ — वे जो मैंने विधवा-विधुर पाठकों से सुने हैं, दिल्ली के ग्रेटर कैलाश से पुणे के कोरेगाँव तक।
- आप किसी और की बात सुनकर जलते नहीं। पहले जब आप सुनते थे कि किसी की शादी है, या कोई जोड़ा हँस रहा है, आपके अंदर एक तीख़ी सूई चुभती थी। अब वह सूई अब भी है, मगर पीड़ा सूई भर है — पूरा तूफ़ान नहीं।
- आप उनकी तस्वीर के बिना भी उन्हें याद कर पाते हैं। यादें अब बाहरी सहारे पर नहीं टिकीं।
- आपके पास खालीपन के लिए शब्द हैं। पहले बस दर्द था। अब आप कह सकते हैं — "मुझे शाम को किसी से चाय पर बात करनी है।" यह तैयारी है।
- आप किसी नए व्यक्ति की तस्वीर देखकर जिज्ञासा महसूस करते हैं। अपराधबोध के साथ, मगर जिज्ञासा तो है।
जो संकेत अधूरे हैं
कुछ संकेत भ्रामक होते हैं। जब बेटी की शादी हो गई हो और घर सूना हो, तो अकेलापन इतना तेज़ होता है कि आप किसी भी चीज़ को तैयारी समझ बैठते हैं। यह अकेलापन है, यह तैयारी नहीं।
जब डॉक्टर कहे कि आपके रक्तचाप के लिए "साथ" ज़रूरी है, तो यह चिकित्सा सलाह है, भावनात्मक नहीं। साथ की तलाश दवा की तरह नहीं होनी चाहिए।
और जब रिश्तेदार कहें "अब उनकी आत्मा को मुक्त कर दो" — यह उनकी असुविधा है। आपकी आत्मा किसी को बाँधती नहीं।
पहला क़दम छोटा होना चाहिए
जब आपको लगे कि हाँ, अब शायद, तो पहले डेटिंग ऐप मत खोलिए। पहले एक कॉफ़ी पर पुरानी सहेली से मिलिए जो भी विधवा हो चुकी है। दूसरे अनुभव सुनिए।
फिर अपना अलमारी देखिए। क्या उनके कपड़े अब भी वैसे ही हैं? क्या उनका टूथब्रश अब भी बेसिन पर है? ये चीज़ें कोई और नहीं हटा सकता आपके लिए। मगर जब आप तैयार हों, तो एक-एक करके हटाइए। यह मान्य धीमापन है।
फिर प्रोफ़ाइल बनाइए — परंतु प्रकाशित मत कीजिए। बस लिखिए। अपने बारे में, जैसे आज हैं। यह देखना कि आप अपने को कैसे लिखते हैं, बड़ा सूचक है।
बच्चे और समाज
बड़े बच्चे अक्सर सबसे मुश्किल हिस्सा होते हैं। मुंबई बांद्रा वेस्ट की एक पाठिका ने बताया कि उनकी 32 साल की बेटी ने कहा: "माँ, दो साल बहुत जल्दी है।" उस पाठिका ने जवाब दिया: "बेटा, तुम्हारे पिता का जाना मेरे लिए था, तुम्हारे लिए नहीं। मेरा कैलेंडर भी मेरा है।"
यह बात प्यार से कही गई थी, परंतु स्पष्टता से। बच्चे समय लेते हैं। मगर आप अपनी ज़िंदगी उनके समय पर नहीं जी सकतीं।
डायसपोरा का अलग दबाव
न्यू जर्सी एडिसन या टोरंटो ब्रैम्पटन में रहने वाले भारतीय पाठकों के लिए यह और मुश्किल है। वहाँ सामुदायिक नज़र है, और अकेलापन भी तीखा। मेरी सलाह वहाँ एक ही है — स्थानीय मंदिर या गुरुद्वारे के बाहर भी एक दुनिया है। वहीं रहिए जहाँ आप ख़ुद को खो न दें।
अगर आप अभी तैयार नहीं
तो नहीं हैं। यह कोई विफलता नहीं। कुछ लोग कभी किसी और से नहीं मिलते, और उनका जीवन अर्थपूर्ण रहता है। कुछ पच्चीस साल बाद मिलते हैं। कुछ पाँच महीने में। सब मान्य है।
यदि आप इसे पढ़ रहे हैं और सोच रहे हैं "मैं कभी तैयार नहीं होऊँगा", तो मैं आपको एक बात देती हूँ: आपने यह लेख पढ़ने का सोचा, यह पहला बीज है। अभी कुछ और करने की ज़रूरत नहीं।
एक छोटी-सी बात आप कर सकते हैं इस सप्ताह — अपने साथी की एक तस्वीर के सामने बैठिए और कहिए: "मुझे आपसे आगे बढ़ना है, मगर आपको छोड़ना नहीं।" दोनों बातें सच हैं।